परछाइयां (Shadows)

रौशनी और अँधेरे के संगम से
निर्मित होती परछाइयों का ये स्याह कोलाहल
निगलता जा रहा मेरा वजूद

प्यार के अफताब में हुई
कुछ  और लम्बी ये परछाइयां

अब कदम बढ़ा या
तो  उस  कोने  की  तरफ
जहाँ एक आफताब  की  ऐसी  आभा  हो
निगल  जाए  जो  तेरी  परछाइयां
और  समर्पित हो जाए तू उस में

या फिर खींच ले कदम उस
गहरे अन्धकार की तरफ
जहाँ ना है एक  चुटकी भी रौशनी की
ना  रहेगा  तेरा  वजूद
ना रह जाएगी तेरी परछाइयां

या फिर बना ले इन्हें अपना साथी
देख इन्हें अपने वर्तमान की नज़र से
ना हो जिसमे अतीत के प्रतिबिम्ब
और ना ही हो उन आँखों में
भविष्य की मह्तावाकंक्षा

पायेगा तू नहीं अलग हैं
तेरी परछाइयां और तू
इनके मिलाप से ही है तेरी परिपूर्णता
ऐसा सम्बन्ध जो है सदियों से
जब तू छोटा है तेरी परछाई बड़ी
और जब तू बड़ा तो तेरी परछाई छोटी

Background: This poem is influenced by an understanding:
If Love is Light, then there are bound to be shadows.

SO, what is the purpose of these shadows and how to to resolve the conflict they produce.

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